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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

प्रज्ञायोग-व्यायाम

 प्रज्ञायोग-व्यायाम                                                                                                                  प्रज्ञायोग-व्यायाम परमपूज्य गुरुदेव श्रीरामशर्मा आचार्य जी द्वारा विकसित किया गया है।इसमें आसनों, उप-आसनों, मुद्राओं, श्वास-प्रश्वास क्रम तथा शरीर संचालन की लोम-विलोम क्रियाओं का सुन्दर समन्वय है। इसे सभी नर,नारी, बालक तथा वृद्ध प्रसन्नतापूर्वक कर सकते हैं। आसन और प्राणायामका यह संयुक्त प्रयोग शरीर और मस्तिष्क, स्थूल और सूक्ष्म दोनों के लिए बहुत ही लाभदायक है। इस व्यायाम की हर मुद्रा के साथ गायत्री मंत्र के अक्षरों को जोड़ देने के कारण शरीर के व्यायाम के साथ मन की एकाग्रता तथा भावनात्मक पवित्रता अभ्यास एक ही साथ होता रहता है।                   

 1.ॐ भूः (ताड़ासन)-धीरे-धीरे श्वास खींचना प्रारंभ करना चाहिए। दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाना चाहिए। दोनों पैर के पंजों के बल खड़े होते हुए शरीर को ऊपर की ओर खींचना चाहिए। दृष्टि आकाश की ओर रखना चाहिए।यह चारों क्रियाएँ एक साथ होनी चाहिए। यह व्यायाम ताड़ासन की तरह सम्पन्न होना चाहिए।सहज रूप से जितनी देर में यह क्रिया की जाए,इससे हृदय की दुर्बलता, रक्तदोष और कोष्ठबद्धता दूर होती हैं।यह मेरुदण्ड के सही विकास में सहायता करता है। स्नायु तंत्र लचीला बनाता तथा शरीर का आलस्य शीघ्र दूर होता है तथा स्फूर्ति आती है।

2. ॐ भुवः(पाद हस्तासन)-श्वास छोड़ते हुए सामने की ओर (कमर से ऊपर का भाग, गर्दन, हाथ साथ-साथ) झुकाना चाहिए। हाथों को हस्तपादासन की तरह नीचे की ओर ले जाते हुए दोनों हाथों से दोनों पैरों के समीप भूमि स्पर्श करना चाहिए।सिर को पैर के घुटनों से यथा संभव स्पर्श कराने का प्रयास करना चाहिए। (घुटने से पैर मुड़ने न पाए)। इसे सामान्य रूप से जितना हो सके उतना ही करना चाहिए। क्रमशः अभ्यास से सही स्थिति बनने लगती है।इससे वायु दोष दूर होते हैं। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना को बल मिलता है। पेट व आमाशय के दोषों को रोकता तथा नष्ट करता है। आमाशय प्रदेश की अतिरिक्त चर्बी भी कम करता है। कब्ज को हटाता है। रीढ़ को लचीला बनाता एवं रक्त संचार में तेजी लाता है।

3.ॐ स्वः (वजासन)-हस्तपादासन की स्थिति में सीधे जुड़े हुए पैरों को घुटनों से मोड़ना चाहिए,दोनों पंजे पीछे की ओर ले जाकर उन पर वज्रासन की तरह बैठ जाना चाहिए। दोनों हाथ घुटनों पर, कमर से मेरूदण्ड तक शरीर सीधा, छाती आगे को उभरी हुई, श्वास-प्रश्वास सामान्य यह एक प्रकार से व्यायाम से पूर्व की आरामदेह या विश्राम की अवस्था है।इससे भोजन पचाने में सहायता, वायु दोष, कब्ज, पेट का भारीपन दूर होता है। यह आमाशय और गर्भाशय की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है,एवं हार्निया से बचाव करता है। गर्भाशय, अमाशय आदि में रक्त व स्नायविक प्रभाव को बल प्रदान करता है।

4. तत् (उष्ट्रासन)-घुटनों पर रखे दोनों हाथ पीछे की तरफ ले जाना चाहिए। हाथ के पंजे पैरों की एडियों पर रखना चाहिए।अब धीरे-धीरे श्वास खींचते हुए उष्ट्रासन की तरह सीने को फुलाते हुए आगे की ओर ऊर्ध्वमुखी खींचना चाहिए। दृष्टि आकाश की ओर से पीछे तरफ हो। इससे पेट, पेडू गर्दन, भुजाओं सबका व्यायाम एक साथ हो जाता है।इससे हृदय, मेरूदण्ड, इडा, पिंगला तथा सुषुम्ना को बल मिलता है। पाचन, मल निष्कासन और प्रजनन प्रणालियों के लिए लाभप्रद है।यह पीठ के दर्द व अर्द्ध-वृत्ताकार  या झुकी हुई पीठ को ठीक करता है।

5. सवितुः (योग मुद्रा)-इसके बाद श्वास छोड़ते हुए पहले की तरह पंजों पर सीधे बैठने की स्थिति में आना चाहिए। साथ ही दोनों हाथ पीछे पीठ की ओर ले जाना चाहिए,या दोनों हाथ की अंगुलियों आपस में फंसाकर धीरे-धीरे दोनों हाथ ऊपर की ओर खींचना चाहिए तथा कमर से आगे झुकाते हुए मस्तक भूमि से स्पर्श कराने का प्रयास योगमुद्रा की तरह करना चाहिए।इससे वायुदोष दूर होता है। यह पाचन संस्थान को तीव्र तथा जठराग्नि को तेज करता है। कोष्ठबद्धता को दूर करता है। यह आसन मणिपुर चक्र को जाग्रत करता है।

6.वरेण्यं (अर्द्धताड़ासन)-इसके बाद धीरे-धीरे सिर ऊपर उठाना चाहिए तथा श्वास खींचते हुए दोनों हाथ बगल से आगे लाते हुए सीधे ऊपर ले जाना चाहिए। बैठक में कोई परिवर्तन नहीं। दृष्टि ऊपर करना चाहिए और हाथों के पंजे देखने का प्रयत्न करें। यह ‘अर्द्धताड़ासन की स्थिति है।इससे हृदय की दुर्बलता दूर होती है, रक्त दोष हटता है और कोष्ठबद्धता दूर होती है। जो लाभ ताड़ासन से होते हैं, वे ही लाभ इस आसन से भी होते हैं।

7.भर्गो (शशकासन)-श्वास छोड़ते हुए कमर से ऊपर के भाग (कमर, रीढ़, हाथ एक साथ) आगे झुकाकर मस्तक धरती से लगाना चाहिए। दोनों हाथ जितना आगे ले जा सकें ले जाकर धरती से सटाना चाहिए।’शशकासन की तरह करना है।इससे उदर के रोग दूर होते हैं। यह कूल्हों और गुदा स्थान के मध्य स्थित माँसपेशियों को सामान्य रखता है।साइटिका के स्नायुओं को शिथिल करता है और एड्रिनल ग्रंथि के कार्य को नियमित करता है। कब्ज को दूर करता है।

8.देवस्य (भुजङ्गासन)-हाथ और पैर के पंजे उसी स्थान पर रखते हुए, श्वास खींचते हुए, कमर उठाते हुए धड़ आगे की ओर ले जाना चाहिए। घुटने जंघाएँ भूमि से छूने देना चाहिए।सीधे हाथों पर कमर से पीछे धड़ को (ऊपर) मोड़ते हुए सीना उठाना चाहिए। गर्दन को ऊपर की ओर तानना चाहिए, ‘भुजङ्गासन’ जैसी मुद्रा बनाना चाहिए।इससे हृदय और मेरूदण्ड को बल मिलता है, यह वायु दोष को दूर करता है। भूख को उत्तेजित करता है तथा कोष्टबद्धता और कब्ज का नाश करता है। जिगर और गुर्दे के लिए लाभदायक है।

9.धीमहि(तिर्यक् भुजङ्गासन-बायें)-भुजङ्गासन की मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं, केवल गर्दन पूरी तरह बायीं ओर मोड़ते हुए दाएँ पैर की एड़ी को देखना चाहिए।इससे भुजङ्गासन जैसे लाभ अभ्यासकर्त्ता को प्राप्त होते हैं।

10. धियो (तिर्यक् भुजङ्गासन-दाएँ)-शरीर की स्थिति पहले जैसी रखते हुए गर्दन दाहिनी ओर मोड़ते हुए बायें पैर की एडी देखना चाहिए।भुजङ्गासन जैसे लाभ अभ्यासकर्त्ता को मिलते हैं।

                                          

11.यो नः(शशकासन)-हाथ-पैर के पंजे अपने स्थान पर ही रखना चाहिए।श्वास छोड़ते हुए घुटने से पैर मोड़ते हुए शशकासन की स्थिति में वापस आना चाहिए।

12.प्रचोदयात् (अर्द्ध ताड़ासन)-यह मुद्रा,अर्द्ध ताड़ासन की तरह की होगी। गहरी श्वास लेते हुए कमर, गर्दन, दोनों हाथ एक साथ उठाना चाहिए। (क्र0 6 की पुनरावृत्ति)

13.भू:(उत्कटासन)-इस मुद्रा में पैर के पंजों के बल उत्कट आसन की तरह बैठते हैं। सीना निकला हुआ, हाथ पंजे के समीप भूमि छूते हुए. सीधे या नमस्कार की मुद्रा में रखना चाहिए। श्वास की गति सामान्य रखें। इससे पिण्डली मजबूत बनती है। शरीर संतुलित होता है।

14. भुवः (पाद हस्तासन)-तलवा धरती से पूरी तरह लगाना चाहिए।घुटने से पैर सीधा करना चाहिए।।कूल्हे उठाना चाहिए। हाथ के पंजों को पैर के पंजों के समीप रखना चाहिए।श्वास बाहर निकालना चाहिए। चित्र सं० 14 की भाँति पाद्-हस्तासन में आएँ। (क्र0-2 की पुनरावृत्ति)


15. स्वः(ताड़ासन)-धीरे-धीरे श्वास लेते हुए कमर से ऊपर का हिस्सा गर्दन, हाथ एक साथ उठाना चाहिए। ताड़ासन की भाँति शरीर को ऊपर की ओर खींचना चाहिए।दृष्टि आकाश की ओर रखना चाहिए। यह चारों क्रियाएँ एक साथ होनी चाहिए।सभी क्रियाएँ ‘ताड़ासन की तरह सम्पन्न होगी। सम्पूर्ण शरीर में खिंचाव अनुभव करना चाहिए। (क्र0-1 की पुनरावृत्ति)


16.ॐ बल की भावना करते हुए सावधान की स्थिति में आना-ॐ का गुंजन करते हुए, हाथों की मुट्ठियाँ कसते हुएबल की भावना के साथ कोहनियाँ मोड़तें हुए, मुट्ठियाँ कंधे के पास से निकालते हुए हाथ नीचे सावधान की स्थिति मेंलाना चाहिए।यह क्रिया श्वास छोड़ते हुए सम्पन्न करना चाहिए।

       इन समस्त क्रियाओं को अपनी स्थिति व क्षमता के अनुरूप 3-4 बार करना चाहिए। क्रिया के साथ पवित्र विचार भाव कासमावेश अवश्य रखना चाहिए। क्रिया व मंत्र के प्रभाव से शरीर में स्फूर्ति, मन में प्रसन्नता व हृदय में भाव-संवेदना का संचार होता हुआ अनुभव करना चाहिए। सम्पूर्ण क्रिया के अन्त में 5-10 मिनट का शवासन अवश्य करना चाहिए।

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