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बुधवार, 17 सितंबर 2025

विश्वकर्मा पूजा : सही तिथि कौन-सी है?

विश्वकर्मा पूजा : सही तिथि कौन-सी है?
आज पूरे भारत में 17 सितम्बर (कन्या संक्रांति) को विश्वकर्मा पूजा मनाने की परंपरा दिखाई देती है। कारखानों, फैक्टरियों, इंजीनियरिंग वर्कशॉपों और मशीनरी संस्थानों में इस दिन औजारों और यंत्रों की पूजा की जाती है। लेकिन क्या यही असली परंपरा है? क्या हमारे पूर्वज भी यही तिथि मानते थे?
प्राचीन परंपरा क्या कहती है?
शिल्पशास्त्र और पुराणों में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के शिल्पी, वास्तुकार और यंत्र निर्माता के रूप में वर्णित किया गया है।
अंग्रेज़ों के आने से पहले, भारत के पूर्वी राज्यों—बिहार, बंगाल और उड़ीसा—में विश्वकर्मा पूजा का पर्व मुख्यतः भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता था।
इस दिन औजारों, हस्तशिल्प और यंत्रों की पूजा करके कारीगर, मजदूर और शिल्पी नई ऊर्जा प्राप्त करते थे।
अंग्रेज़ी शासन का प्रभाव
19वीं शताब्दी में अंग्रेज़ों के शासनकाल में कारखाने और मशीनरी भारत में आई।
औद्योगिक संस्थानों में पूजा की सुविधा के लिए एक “निश्चित अंग्रेज़ी कैलेंडर की तिथि” चुनी गई।
तब 17 सितम्बर (सूर्य का कन्या राशि में प्रवेश) को विश्वकर्मा पूजा दिवस घोषित किया गया।
धीरे-धीरे यही तिथि पूरे भारत में प्रचलित हो गई और असली परंपरा पीछे छूट गई।
क्यों महत्वपूर्ण है भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी?
यह तिथि ऋतु परिवर्तन और नव निर्माण का समय होती है।इस दिन पूजा करने से औजारों की शक्ति, कार्य की सफलता और शिल्प में प्रगति का आशीर्वाद मिलता है।हमारे पूर्वजों ने इस तिथि को विशेष मानकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका पालन किया था।
जागरूकता की आवश्यकता
आज हमें समझना चाहिए कि 17 सितम्बर की तिथि अपेक्षाकृत नई और अंग्रेज़ी काल की देन है।हमारी प्राचीन परंपरा के अनुसार असली विश्वकर्मा पूजा का दिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी है।
यदि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं तो हमें इस तिथि पर पूजा-अर्चना करके विश्वकर्मा भगवान का स्मरण करना चाहिए।
✍️ संदेश :
“आइए, हम सब मिलकर अपने समाज में यह जागरूकता फैलाएँ कि विश्वकर्मा पूजा का सही दिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी है। यही हमारी परंपरा है, यही हमारी असली पहचान है।”

शिल्पिनां अधिदेवोऽसि विश्वकर्मा नमोऽस्तु ते।
त्वत्प्रसादात् भवेद्योगः कर्मसु सिद्धिरुत्तमा॥
(अर्थ: हे विश्वकर्मा! आप शिल्पियों के अधिदेव हैं। आपको नमस्कार है। आपके प्रसाद से ही हमारे कर्मों में सफलता और उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है।
✨ जागरूकता स्लोगन ✨
1. “विश्वकर्मा पूजा अंग्रेज़ी नहीं, भारतीय परंपरा से करें।”
2. “सही तिथि – भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी, यही है असली विश्वकर्मा जयंती।”
3. “औजारों की शक्ति, शिल्प की प्रगति – विश्वकर्मा पूजा सही तिथि।”
4. “अपनी जड़ों से जुड़ें, परंपरा को पहचानें।”
5. “भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी – शिल्पियों का असली पर्व।”
6.विश्वकर्मा पूजा की असली तिथि 17 सितम्बर नहीं, बल्कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी है।