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रविवार, 17 अप्रैल 2022

कुल देवी माता बन्दी देवी की उपासना


 कुल देवी माता बन्दी देवी की उपासना

॥साधन-सज्जा॥
पूजा स्थल को पवित्र करना चाहिए तथा पूजन सामग्री को सजाना चाहिए।
॥दर्भ या पवित्री धारण॥
दोनों अनामिकाओं में पवित्री धारण करना चाहिए-
प्रार्थना-
विरञ्चिना    सहोत्पन्न     परमेष्ठि    निसर्जन।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकारो भव ॥
धारण-दो पवित्री दाहिने हाथ तथा तीन पवित्री बाएँ हाथ की अनामिका में धारण करना चाहिए-
ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। 
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनःतच्छकेयम् ।        
॥शिखाबन्धन॥
दाहिने हाथ की अँगुलियों को गीला कर शिखा स्थान का स्पर्श करना चाहिए।मन्त्र बोलने के बाद शिखा में ऐसी 
गाँठ लगानी चाहिए,जो सिरा खींचने से खुल जाय,इसे आधी गाँठ कहते हैं। 
ॐ चिरूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे ॥ 
॥चन्दनधारण॥
मन्त्र पढते हुए पहले बन्दी माता को चन्दन लगाना चाहिए,तत्पश्चात् स्वयं के आज्ञा चक्र पर चन्दन लगाना चाहिए-
चन्दनस्य महत्पुण्यं, पवित्रे पापनाशनम् ।
आपदां हरते नित्यं, लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा॥
कांति लक्ष्मी श्रुति सौख्ये सौभाग्यमतुलं ममः ।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ॥
केशवानन्त गोविन्द वाराह पुरुषोतमं ।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं में प्रसीदतु ॥
॥आचमन॥ 
जल भरे पात्र में से दाहिने हाथ की हथेली पर जल लेकर तीन बार आचमन करना चाहिए।आचमन के समय 
आचमन मंत्र पढ़ना चाहिए-
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥१॥
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ||२|| 
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि,श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥३॥
॥मार्जन॥
पहले विनियोग पढ़ लेना चाहिए,तब जल छिड़कना या मार्जन करना चाहिए -
विनियोग-ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता गायत्रीच्छन्दः हृदि पवित्रकरणे
विनियोगः ।
इस प्रकार विनियोग पढ़कर जल छोड़े' तथा निम्नलिखित मन्त्रसे मार्जन करे (शरीर एवं सामग्रीपर जल छिड़के)-
मन्त्र- 
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।         
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
॥पृथ्वी पूजन॥
ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसन पवित्रकरणे विनियोगः।
धरती माँ को हाथ से स्पर्श करके मन्त्र बोलते हुए नमस्कार करना चाहिए-
ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका,देवि! त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम् ॥
॥सङ्कल्प॥
सङ्कल्प बोलने के पूर्व गोत्र,मास,तिथि तथा वार की जानकारी कर लेनी चाहिए।इनका प्रयोग करते हुए सङ्कल्प 
बोलना चाहिए-
ॐ विष्णवे नमः,ॐ विष्णवे नमः,ॐ विष्णवे नमः।ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत 
मन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे..............क्षेत्रे 
नगरे पक्षे...........ग्रामे ............नाम-संवत्सरे....... मासे (शुक्ल/कृष्ण)पक्षे.............तिथौ...... वासरे....... गोत्र: शर्मा/
वर्मा/गुप्तोऽहम् प्रातः (मध्याह्ने, सायं) सर्वकर्मसु शुद्ध्यर्थं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्री भगवत्प्रीत्यर्थं च 
कुलदेवी माता बन्दीपूजनं  करिष्ये।
॥घण्टी वादन॥
मन्त्र पढते हुए घण्टी बजाना चाहिए-
आगमार्थं तु देवानां गमनार्थंच रक्षसाम् ।
कुरु घण्टे वरं नादं देवतास्थान संनिधौ।।                
घण्टीस्थिताय गरुडाय नमः।
॥दीप ज्वालन॥
दीपो ज्योतिपरमब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं सान्ध्य दीप नमोऽस्तुते ॥
शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यं सुख सम्पदम् ।
शत्रु बुद्धि विनाशं च दीपो ज्योतिर्नमोऽस्तुते ।।
भो दोप! देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत।
यावत् कर्म समाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव ॥
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारकाः।
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः॥
ॐअग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा।
सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा।
अग्निर्वच्चो ज्योतिर्वर्च्च: स्वाहा।
सूर्यो वर्च्चो ज्योतिर्वच्चः स्वाहा।
ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।
॥कलश स्थापन॥
वरुण नमन एवं आवाहन-
ॐवरुणाय नमः।आवाहयामि।स्थापयामि।ध्यायामि।ततो नमस्कारं करोमि।
तीर्थों का आवाहन-
कलश में जल भरते हुए मन्त्र पढें-
सर्वे समुद्राःसरितस्तीर्थानि जलदा नदाः ।
आयान्तु  देवपूजार्थं दुरितं क्षयकारकाः ॥
गङ्गे च  यमुने   चैव  गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सनिधिं कुरु॥
कलशस्थ देवताओं को नमन एवं आवाहन-
कलश को स्पर्श करते हुए मन्त्र पढें-
ॐकलशस्थ देवताभ्यो नमः।आवाह्यामि।स्थापयामि।ध्यायामि।ततो नमस्कारं करोमि।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोदभवः।
सान्निध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा॥
॥गुरु  नमन
ॐ नमः शिवाय गुरवे सच्चिदानन्दमूर्तये।
निष्प्रपंचाय शान्ताय निरालम्बाय तेजसे ॥
॥सर्वदेव नमन॥
श्री मन्महागणाधिपतये नमः। लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः। उमामहेश्वराभ्यां नमः ।वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नमः। शचीपुरन्दराभ्यां नमः । माता पितृचरण कमलेभ्यो नमः।इष्ट देवताभ्यो नमः। कुलदेवताभ्यो नमः। ग्राम देवताभ्योः नमः। स्थान देवताभ्यो नमः। वास्तुदेवताभ्यो नमः।सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।एतत् कर्म प्रधान कुल देवौ बन्दी देव्यै नम:।
सतोय पाथोद समान कान्तिम्,अम्भोज पीयूषकरी हस्ताम्।
सुराङ्गना सेवित पाद पद्माम् भजामि, बन्दीं भव-बन्ध मुक्तये ।।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।आवाहयामि,स्थापयामि,ध्यायामि।ततो नमस्कारं करोमि। 
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।हस्तयोःअर्ध्यं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।आचमनीयं जलं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।स्नानीयं जलं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।वस्त्रं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।सौभाग्यसूत्रं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।गन्धं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।चन्दनं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।पुष्पं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।विल्वपत्राणि समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।धूपं आघ्रापयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।दीपं दर्शयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।आचमनीयं जलं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।पूगीफलं समर्पयामि।
(इसके बाद बन्दी मोचन स्तोत्र का पाठ करना।)
बन्दी मोचन स्तोत्रम्-
ॐ बन्दी देव्यै नममस्कृत्य वरदाभय शोभिनीम्।
तदग्रयां शरणं गच्छे शीघ्रं मोचं ददातु मे ॥
त्वं बन्दी कमल पत्राक्षी लौह शृंखला भञ्जिनीम्।
प्रसादं कुरु मे देवि!रजनी चैव शीघ्रं मोचं ददातु मे ॥
त्वं बन्दी त्वं महामाया,त्वं दुर्गा त्वं सरस्वती ।
त्वं देवी रजनी चैव, शीघ्रं मोचं ददातु मे ॥
संसार तारिणी बन्दी सर्वकाम प्रदायिनी।
सर्व लोकेश्वरी देवि! शीघ्रं मोचं ददातु मे ॥
त्वं ह्रीं त्वमीश्वरी देवी ब्रह्माणी ब्रह्म वादिनी ।
त्वं वै कल्प-क्षय कर्त्रीं शीघ्रं मोचं ददातु मे ॥
देवी धात्री धरित्री च धर्मशास्त्रार्थ भाषिणी ।
दुःश्वासाम्ब रागिनी देवि,शीघ्र मेोचं ददातु मे ॥
नमोऽस्तुते महालक्ष्मी रत्नकुण्ड भूषिते ।
शिवस्यार्धाङ्गिनी चैव शीघ्रं मोचं ददातु मे ॥
नमस्कृत्य महादुर्गा भयात्तु तीरिणीं शिवाम् ।
महादुखहरां   चैव,   शीघ्रं मोचं ददातु   मे ॥
इदं स्तोत्र महापुण्य यः पठेन्नित्यमेव    च ।
सर्वबन्धविनिमुक्तो मोक्षं च लभते क्षणात् ॥
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।स्तवपाठं समर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।तर्पयामि।
ॐ कुल देव्यै बन्दी देव्यै नम:।नमस्कारान् समर्पयामि।
बन्दी मोचन मन्त्र-
विनियोग- ॐ अस्य श्री बन्दी मोचन मन्त्रस्य,श्री कण्व ऋषिःत्रिष्टुप् छन्दः श्री बन्दी देवता ह्री बीजं ह्रूं कीलकं कुल देवी
माता बन्दी प्रीतये न्यासे जपे च विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यास- ॐकण्व ऋषये नमः शिरसि,त्रिष्टुप छन्दसे नमःमुखे,श्री बन्दी देव्यै नमः हृदि, ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये,ह्रूं शक्त्यै नमः पादौ, ऊँ बन्दी देव्यै कीलकाय नमः सर्वाङ्गे।
     ''ॐ ह्रीं हूं बन्दी देव्यै नमः'' से हाथ शुद्धि ।
करन्यास- ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः।ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ बन्दी अनामिकाभ्यां नमः ।ॐ देव्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः।ॐ नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादि न्यास-ॐ हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा ।ॐ ह्रूं शिखायै वषट्।ॐ बन्दी कवचाय हुम्।ॐ देव्यै नेत्र त्रयाय वौषट्।ॐनमः अस्त्राय फट्।
ध्यान-
सतोय पाथोद समान कान्तिम्,अम्भोज पीयूषकरी हस्ताम्।
सुराङ्गना सेवित पाद पद्माम् भजामि, बन्दीं भव-बन्ध मुक्तये ।।
ॐ कुल देवौ बन्दी देव्यै नम:।आवाहयामि,स्थापयामि,ध्यायामि।ततोनमस्कारं करोमि।
मन्त्र-ॐ ह्रीं ह्रूं बन्दी देव्यै नमः।
हवन विधि-कमलगट्टा,गाय के घी,शहद,हल्दी एवं लाल चन्दन के चूर्ण को मिलाकर जप संख्या का दशांश हवन।
हवन मन्त्र-ॐ ह्रीं ह्रूं बन्दी देव्यै नमःस्वाहा।इदं बन्दी देव्यै इदं न मम।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

सूर्य नमस्कार

 सूर्य नमस्कार-                                                                                                                                 1.प्रणाम स्थिति-हृदय के पास अनाहत चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ मित्राय नमः मंत्र बोलते हुए दोनों हाथों को जोड़कर सीने के पास रखना चाहिए एवं दृष्टि सामने की ओर रखना चाहिए। दोनों पैरों की एड़ी को मिलाकर रखना चाहिए।                                                                                                                                                             2 हस्तोत्थानासन-गले के पास विशुद्धि चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ रवये नमः मंत्र बोलते हुए दोनों हाथों को श्वास भरते हुए ऊपर.उठाना चाहिए।                                                                                                                   3.पाद हस्तासन-नाभि के नीचे पेडू के पास स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ सूर्याय नमःमंत्र बोलते हुए एवं श्वास छोड़ते हुए मस्तक को घुटने से एवं हाथों को जमीन से लगाने का प्रयास करना चाहिए।                             4.अश्व संचालनासन-दोनों भौंहों के बीच आज्ञा चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ भानवे नमः मंत्र बोलते हुए एक पैर को पीछे ले जाना चाहिए एवं दोनों हाथों को एक साथ रखना चाहिए तथा छाती को ऊपर उठाना चाहिए।                5.दण्डासन-नाभि के ऊपर मणिपुर चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ खगाय नमः मंत्र बोलते हुए दोनों पैरों को पीछे ले जाना चाहिए एवं दोनों हाथों को आगे रखना चाहिए। इसमें हमारी स्थिति डंडे के समान होती है।                         6.अष्टांग नमस्कार-हृदय के पास अनाहत चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ पूष्णे नमः मंत्र बोलते हुए एवं श्वास छोड़ते हुए घुटने, छाती ठुड्डी व मस्तक को जमीन पर लगाना चाहिए।                                                                     7.भुजङ्गासन-नाभि के नीचे पेडू के पास स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ हिरण्यगर्भाय नमः मंत्र बोलते हुए एवं दोनों हाथों को कंधे के पास रखते हुए धड़ वाले हिस्से को ऊपर उठाना चाहिए।यह क्रिया श्वास लेते हुए करना चाहिए।                                                                                                                                                   8.पर्वतासन-गले के पास विशुद्धि चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ मारीचये नमः मंत्र बोलते हुए  श्वास छोड़ते हुए मस्तक को जमीन से लगाना चाहिए एवं नाभि को देखने का प्रयास करना चाहिए।                                                   9.अश्वसंचालनासन-दोनों भौंहों के बीच आज्ञा चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ आदित्याय नमः मंत्र बोलते हुए एवं श्वांस लेते हुए एक पैर को आगे ले आना चाहिए व दोनों हाथों को एक साथ रखकर छाती को ऊपर उठाना चाहिए।                                                                                                                                                  10.पाद हस्तासन-नाभि के नीचे पेडू के पास स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ सवित्रे नमः मंत्र बोलते हुए तथा श्वास छोड़ते हुए दोनों पैरों को एक साथ ले आना चाहिए एवं मस्तक को घुटने से व हाथों को जमीन से लगाने का प्रयास करना चाहिए।                                                                                                                                  11.हस्तोत्थानासन-गले के पास विशुद्धि चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ अर्काय नमः मंत्र बोलते हुए एवं दोनों हाथों को श्वास भरते हुए ऊपर उठाना चाहिए।                                                                                                            12. प्रणाम स्थिति-हृदय के पास अनाहत चक्र का ध्यान करते हुए तथा ॐ भास्कराय नमः मंत्र बोलते हुए दोनों हाथों को जोड़कर सीने के पास रखना चाहिए एवं दृष्टि सामने की ओर रखना चाहिए


वैवाहिक समस्या निवारण

 वैवाहिक समस्या निवारण

मङ्गल चण्डिका स्तोत्र
      यह मङ्गल चण्डिका पाठ देवी भागवत से लिया गया है। यदि किसी स्त्री का पति के साथ झगड़ा-झंझट हो रहा हो या अलगाव जैसी स्थिति उत्पन्न हो या लड़की की विवाह निश्चित करने में देर हो रहा हो तथा अत्यधिक कठिनाई आ रही हो,तो उस स्त्री या लड़की को  मङ्गल चण्डिका स्तोत्र का पाठ मङ्गलवार को आठ बार स्वतः पढ़ना चाहिए या श्रवण करना चाहिए।
       पढ़ने या श्रवण करने से पूर्व दुर्गाजी के फोटो पर लाल पूजा सामग्री -लाल फूल, लाल अक्षत, लाल चन्दन, लाल रोली, सिन्दूर, लाल कपड़ा, लाल कपड़े की बाती के दीपक से पूजा करना चाहिए। पाठ करने तक लाल कपड़े की बत्ती का दीपक घी का जलाना चाहिए। पाठ श्रवण कर अपनी सौभाग्य प्राप्ति की शीघ्र कामना करनी चाहिए।इसका फल बड़ा ही उत्तम है। बहुत सी स्त्रियों तथा लड़कियों को यह व्रत करने से  उन्हें शीघ्र लाभ हुआ है। पाठ करने के पहले दाहिने हाथ में अक्षत,जल,फूल लेकर संकल्प करते हुए जल को भूमि पर छोड़ देना चाहिए तथा पाठ को पढना या श्रवण करना चाहिए।
ध्यान-
 देविं षोडसवर्षीयां शास्वतसुस्थिर  यौवनम् । 
बिम्बोष्टिं शुचतिं सुधां शरद् पद्य निभाननाम् । 
श्वेत चम्पक वर्णाभां   सुनिलोत्पल लोचनाम् । 
जगद् धात्रिं च दात्रिं च सर्वेभ्यःसर्वसभ्यदाम् । 
संसार सागरे  घोरे   ज्योति रूपां  सदा  भजे ।
देव्याश्च  ध्यान्    नित्येयं    स्तवनं श्रूयतां मुने।
स्तोत्र-
रक्ष रक्ष जगन्मति देवि मङ्गल चण्डिके।
 हारिके विपदां रार्शे हर्ष मङ्गल कारिके। 
हर्ष मङ्गल दक्षे च हर्ष मङ्गल दायिके। 
शुभे मङ्गल दक्षे च शुभे मङ्गल चण्डिके। 
शुभे मङ्गले मङ्गलार्हे च सर्व मङ्गल मङ्गले।
सतां मङ्गलदे देवि सर्वेषां मङ्गलालये। 
पूज्ये मङ्गलवारस्य च मङ्गलाभिष्ट देवते ।
पूज्ये मङ्गल भूपस्य मनुवंशस्य संततम् ।
मङ्गल अधिष्ठात्रि देवि मङ्गलानाश्च मङ्गले
संसारे मङ्गलाधारे मोक्ष मङ्गलदायिनी।
सारे च मङ्गलाधारे पारे च सर्व कर्मणाम् ।
प्रति मङ्गलावारे च पूज्ये मङ्गल शुभप्रदे।
स्तोस्त्रेण अनेन शम्भुश्च श्रूयतां मङ्गलचण्डिकाम् ।
प्रति मङ्गलवारे च पूजां दत्वा गतः शिवः ।
प्रथमे पूजिता देवोः शिवेन सर्व मङ्गला
द्वितीये पूजिता सा च मङ्गलेन् ग्रहेण च ।
तृतीये पूजिता भद्रा मङ्गलेन नृपेण ध।
चतुर्थे मङ्गलवारे सुन्दरिभिः सुपूजिता ।
पंचमे मङ्गलाकांक्षी नरैः मङ्गलचण्डिका ।
पूजिता प्रतिविश्वेसु विश्वेश पूजिता सदा ।
ततः सर्वत्र सम्पूज्य वभूव परमेश्वरी ।
देवैश्च मुनिभिः चैव मानवै: मुनिभिः मुने ।
देव्याश्च मङ्गलस्तोत्रम् यः शृणोति समाहिता ।
तद् मङ्गलम् भवेत् तस्य न भवेद् अमङ्गला ।
वर्धते पुत्र पौत्रेश्च मङ्गलं च दिने-दिने ।
मन्त्र-
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्व पूज्ये देवि मङ्गलचण्डिके हूँ हूँ फट् स्वाहा ।
   उक्त स्तोत्र का पाठ श्रवण प्रति मङ्गलवार को आठ बार करें। उसके बार ही सात्विक मीठा भोजन करें। कम से कम लगातार चार मङ्गलवार को यह स्तोत्र श्रवण करना चाहिए।अन्तिम मङ्गलवार को गुड़ घी मिलाकर 108 बार “ॐ मङ्गल चण्डिका देव्यै नमः स्वाहा" मन्त्र से हवन कर देना चाहिए। किसी स्त्री का पति से झगड़ा-झंझट तथा अन्य विवाह संबंधी समस्या एवं लड़कियों की शीघ्र विवाह के लिए यह स्तोत्र रामबाण है।

प्रज्ञायोग-व्यायाम

 प्रज्ञायोग-व्यायाम                                                                                                                  प्रज्ञायोग-व्यायाम परमपूज्य गुरुदेव श्रीरामशर्मा आचार्य जी द्वारा विकसित किया गया है।इसमें आसनों, उप-आसनों, मुद्राओं, श्वास-प्रश्वास क्रम तथा शरीर संचालन की लोम-विलोम क्रियाओं का सुन्दर समन्वय है। इसे सभी नर,नारी, बालक तथा वृद्ध प्रसन्नतापूर्वक कर सकते हैं। आसन और प्राणायामका यह संयुक्त प्रयोग शरीर और मस्तिष्क, स्थूल और सूक्ष्म दोनों के लिए बहुत ही लाभदायक है। इस व्यायाम की हर मुद्रा के साथ गायत्री मंत्र के अक्षरों को जोड़ देने के कारण शरीर के व्यायाम के साथ मन की एकाग्रता तथा भावनात्मक पवित्रता अभ्यास एक ही साथ होता रहता है।                   

 1.ॐ भूः (ताड़ासन)-धीरे-धीरे श्वास खींचना प्रारंभ करना चाहिए। दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाना चाहिए। दोनों पैर के पंजों के बल खड़े होते हुए शरीर को ऊपर की ओर खींचना चाहिए। दृष्टि आकाश की ओर रखना चाहिए।यह चारों क्रियाएँ एक साथ होनी चाहिए। यह व्यायाम ताड़ासन की तरह सम्पन्न होना चाहिए।सहज रूप से जितनी देर में यह क्रिया की जाए,इससे हृदय की दुर्बलता, रक्तदोष और कोष्ठबद्धता दूर होती हैं।यह मेरुदण्ड के सही विकास में सहायता करता है। स्नायु तंत्र लचीला बनाता तथा शरीर का आलस्य शीघ्र दूर होता है तथा स्फूर्ति आती है।

2. ॐ भुवः(पाद हस्तासन)-श्वास छोड़ते हुए सामने की ओर (कमर से ऊपर का भाग, गर्दन, हाथ साथ-साथ) झुकाना चाहिए। हाथों को हस्तपादासन की तरह नीचे की ओर ले जाते हुए दोनों हाथों से दोनों पैरों के समीप भूमि स्पर्श करना चाहिए।सिर को पैर के घुटनों से यथा संभव स्पर्श कराने का प्रयास करना चाहिए। (घुटने से पैर मुड़ने न पाए)। इसे सामान्य रूप से जितना हो सके उतना ही करना चाहिए। क्रमशः अभ्यास से सही स्थिति बनने लगती है।इससे वायु दोष दूर होते हैं। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना को बल मिलता है। पेट व आमाशय के दोषों को रोकता तथा नष्ट करता है। आमाशय प्रदेश की अतिरिक्त चर्बी भी कम करता है। कब्ज को हटाता है। रीढ़ को लचीला बनाता एवं रक्त संचार में तेजी लाता है।

3.ॐ स्वः (वजासन)-हस्तपादासन की स्थिति में सीधे जुड़े हुए पैरों को घुटनों से मोड़ना चाहिए,दोनों पंजे पीछे की ओर ले जाकर उन पर वज्रासन की तरह बैठ जाना चाहिए। दोनों हाथ घुटनों पर, कमर से मेरूदण्ड तक शरीर सीधा, छाती आगे को उभरी हुई, श्वास-प्रश्वास सामान्य यह एक प्रकार से व्यायाम से पूर्व की आरामदेह या विश्राम की अवस्था है।इससे भोजन पचाने में सहायता, वायु दोष, कब्ज, पेट का भारीपन दूर होता है। यह आमाशय और गर्भाशय की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है,एवं हार्निया से बचाव करता है। गर्भाशय, अमाशय आदि में रक्त व स्नायविक प्रभाव को बल प्रदान करता है।

4. तत् (उष्ट्रासन)-घुटनों पर रखे दोनों हाथ पीछे की तरफ ले जाना चाहिए। हाथ के पंजे पैरों की एडियों पर रखना चाहिए।अब धीरे-धीरे श्वास खींचते हुए उष्ट्रासन की तरह सीने को फुलाते हुए आगे की ओर ऊर्ध्वमुखी खींचना चाहिए। दृष्टि आकाश की ओर से पीछे तरफ हो। इससे पेट, पेडू गर्दन, भुजाओं सबका व्यायाम एक साथ हो जाता है।इससे हृदय, मेरूदण्ड, इडा, पिंगला तथा सुषुम्ना को बल मिलता है। पाचन, मल निष्कासन और प्रजनन प्रणालियों के लिए लाभप्रद है।यह पीठ के दर्द व अर्द्ध-वृत्ताकार  या झुकी हुई पीठ को ठीक करता है।

5. सवितुः (योग मुद्रा)-इसके बाद श्वास छोड़ते हुए पहले की तरह पंजों पर सीधे बैठने की स्थिति में आना चाहिए। साथ ही दोनों हाथ पीछे पीठ की ओर ले जाना चाहिए,या दोनों हाथ की अंगुलियों आपस में फंसाकर धीरे-धीरे दोनों हाथ ऊपर की ओर खींचना चाहिए तथा कमर से आगे झुकाते हुए मस्तक भूमि से स्पर्श कराने का प्रयास योगमुद्रा की तरह करना चाहिए।इससे वायुदोष दूर होता है। यह पाचन संस्थान को तीव्र तथा जठराग्नि को तेज करता है। कोष्ठबद्धता को दूर करता है। यह आसन मणिपुर चक्र को जाग्रत करता है।

6.वरेण्यं (अर्द्धताड़ासन)-इसके बाद धीरे-धीरे सिर ऊपर उठाना चाहिए तथा श्वास खींचते हुए दोनों हाथ बगल से आगे लाते हुए सीधे ऊपर ले जाना चाहिए। बैठक में कोई परिवर्तन नहीं। दृष्टि ऊपर करना चाहिए और हाथों के पंजे देखने का प्रयत्न करें। यह ‘अर्द्धताड़ासन की स्थिति है।इससे हृदय की दुर्बलता दूर होती है, रक्त दोष हटता है और कोष्ठबद्धता दूर होती है। जो लाभ ताड़ासन से होते हैं, वे ही लाभ इस आसन से भी होते हैं।

7.भर्गो (शशकासन)-श्वास छोड़ते हुए कमर से ऊपर के भाग (कमर, रीढ़, हाथ एक साथ) आगे झुकाकर मस्तक धरती से लगाना चाहिए। दोनों हाथ जितना आगे ले जा सकें ले जाकर धरती से सटाना चाहिए।’शशकासन की तरह करना है।इससे उदर के रोग दूर होते हैं। यह कूल्हों और गुदा स्थान के मध्य स्थित माँसपेशियों को सामान्य रखता है।साइटिका के स्नायुओं को शिथिल करता है और एड्रिनल ग्रंथि के कार्य को नियमित करता है। कब्ज को दूर करता है।

8.देवस्य (भुजङ्गासन)-हाथ और पैर के पंजे उसी स्थान पर रखते हुए, श्वास खींचते हुए, कमर उठाते हुए धड़ आगे की ओर ले जाना चाहिए। घुटने जंघाएँ भूमि से छूने देना चाहिए।सीधे हाथों पर कमर से पीछे धड़ को (ऊपर) मोड़ते हुए सीना उठाना चाहिए। गर्दन को ऊपर की ओर तानना चाहिए, ‘भुजङ्गासन’ जैसी मुद्रा बनाना चाहिए।इससे हृदय और मेरूदण्ड को बल मिलता है, यह वायु दोष को दूर करता है। भूख को उत्तेजित करता है तथा कोष्टबद्धता और कब्ज का नाश करता है। जिगर और गुर्दे के लिए लाभदायक है।

9.धीमहि(तिर्यक् भुजङ्गासन-बायें)-भुजङ्गासन की मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं, केवल गर्दन पूरी तरह बायीं ओर मोड़ते हुए दाएँ पैर की एड़ी को देखना चाहिए।इससे भुजङ्गासन जैसे लाभ अभ्यासकर्त्ता को प्राप्त होते हैं।

10. धियो (तिर्यक् भुजङ्गासन-दाएँ)-शरीर की स्थिति पहले जैसी रखते हुए गर्दन दाहिनी ओर मोड़ते हुए बायें पैर की एडी देखना चाहिए।भुजङ्गासन जैसे लाभ अभ्यासकर्त्ता को मिलते हैं।

                                          

11.यो नः(शशकासन)-हाथ-पैर के पंजे अपने स्थान पर ही रखना चाहिए।श्वास छोड़ते हुए घुटने से पैर मोड़ते हुए शशकासन की स्थिति में वापस आना चाहिए।

12.प्रचोदयात् (अर्द्ध ताड़ासन)-यह मुद्रा,अर्द्ध ताड़ासन की तरह की होगी। गहरी श्वास लेते हुए कमर, गर्दन, दोनों हाथ एक साथ उठाना चाहिए। (क्र0 6 की पुनरावृत्ति)

13.भू:(उत्कटासन)-इस मुद्रा में पैर के पंजों के बल उत्कट आसन की तरह बैठते हैं। सीना निकला हुआ, हाथ पंजे के समीप भूमि छूते हुए. सीधे या नमस्कार की मुद्रा में रखना चाहिए। श्वास की गति सामान्य रखें। इससे पिण्डली मजबूत बनती है। शरीर संतुलित होता है।

14. भुवः (पाद हस्तासन)-तलवा धरती से पूरी तरह लगाना चाहिए।घुटने से पैर सीधा करना चाहिए।।कूल्हे उठाना चाहिए। हाथ के पंजों को पैर के पंजों के समीप रखना चाहिए।श्वास बाहर निकालना चाहिए। चित्र सं० 14 की भाँति पाद्-हस्तासन में आएँ। (क्र0-2 की पुनरावृत्ति)


15. स्वः(ताड़ासन)-धीरे-धीरे श्वास लेते हुए कमर से ऊपर का हिस्सा गर्दन, हाथ एक साथ उठाना चाहिए। ताड़ासन की भाँति शरीर को ऊपर की ओर खींचना चाहिए।दृष्टि आकाश की ओर रखना चाहिए। यह चारों क्रियाएँ एक साथ होनी चाहिए।सभी क्रियाएँ ‘ताड़ासन की तरह सम्पन्न होगी। सम्पूर्ण शरीर में खिंचाव अनुभव करना चाहिए। (क्र0-1 की पुनरावृत्ति)


16.ॐ बल की भावना करते हुए सावधान की स्थिति में आना-ॐ का गुंजन करते हुए, हाथों की मुट्ठियाँ कसते हुएबल की भावना के साथ कोहनियाँ मोड़तें हुए, मुट्ठियाँ कंधे के पास से निकालते हुए हाथ नीचे सावधान की स्थिति मेंलाना चाहिए।यह क्रिया श्वास छोड़ते हुए सम्पन्न करना चाहिए।

       इन समस्त क्रियाओं को अपनी स्थिति व क्षमता के अनुरूप 3-4 बार करना चाहिए। क्रिया के साथ पवित्र विचार भाव कासमावेश अवश्य रखना चाहिए। क्रिया व मंत्र के प्रभाव से शरीर में स्फूर्ति, मन में प्रसन्नता व हृदय में भाव-संवेदना का संचार होता हुआ अनुभव करना चाहिए। सम्पूर्ण क्रिया के अन्त में 5-10 मिनट का शवासन अवश्य करना चाहिए।

शिवोपासना विधि


 शिवोपासना विधि 

पूर्वाङ्ग कर्मकांड-
॥पवित्रीकरण॥
विनियोग-ॐ अपवित्रः पवित्रोवेत्यस्य वामदेव ऋषिः विष्णुर्देवता गायत्री-छन्दः हृदि पवित्रकरणे विनियोगः ।
बाँये हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से पवित्रीकरण मंत्र पढ़कर उस जल को सिर तथा सारे शरीर पर छिड़कें-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः   स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं,   स  बाह्याभ्यन्तरः  शुचिः ॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।
॥आचमन॥
 जल भरे पात्र में से दाहिने हाथ की हथेली पर जल लेकर तीन बार आचमन करें।आचमन के समय आचमन मंत्र पढ़ें-
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥१॥
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा ||२|| 
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि,श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥३॥
॥शिखाबन्धन॥
दाहिने हाथ की अँगुलियों को गीला कर शिखा स्थान का स्पर्श करें।मन्त्र बोलने के बाद शिखा में ऐसी गाँठ लगानी चाहिए,जो सिरा खींचने से खुल जाय,इसे आधी गाँठ कहते हैं। जिनके संयोगवश शिखा नहीं,ऐसे व्यक्ति तथा महिलाएँ उस स्थान को भावनापूर्वक स्पर्श करें।इस समय शिखाबन्धन मंत्र का उच्चारण करते जाना चाहिए-
ॐ चिरूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे ॥ 
॥न्यास॥
बायें हाथ की हथेली पर जल लेना, दाहिने हाथ की पाँचों अँगुलियों को इकट्ठा करना, उन एकत्रित अँगुलियों को हथेली वाले जल में डुबोना।अब जहाँ-जहाँ मन्त्रोच्चार के संकेत हो, वहाँ-वहाँ पहले बायीं ओर फिर दाहिनी ओर के क्रम से स्पर्श करते हुए हर बार में एकत्रित अँगुलियाँ डुबोते और लगाते चलना- यह न्यास कर्म है। 
ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु।(मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु।(नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु।(दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु।(दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोमें बलमस्तु।(दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोमें ओजोऽस्तु।(दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि,तनूस्तन्वा मे सह सन्तु। (समस्त शरीरपर)
॥पृथ्वी पूजन॥
ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसन पवित्रकरणे विनियोगः।
धरती माँ को हाथ से स्पर्श करके मन्त्र बोलते हुए नमस्कार करें-
ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका, देवि! त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम् ।
॥रुद्राक्ष धारण॥
मन्त्र पढते हुए रुद्राक्ष धारण करें-
अघोरेभ्यो ऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्य:
सर्वशर्वेभ्यो     नमस्तेऽस्तु       रुद्ररूपेभ्यः ॥
॥दर्भ या पवित्री धारण॥
प्रार्थना-
विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठि निसर्जन।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकारो भव ॥
धारण-दो पवित्री दाहिने हाथ तथा तीन पवित्री बाएँ हाथ की अनामिका में धारण करें-
ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। 
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनःतच्छकेयम् । 
॥भस्मधारण
भस्म अभिमन्त्रण- ॐ अग्निरिति भस्म ।ॐ वायु रिति भस्मा ॐ जलमिति भस्म । ॐ स्थलमिति भस्म ।ॐ व्योमेति भस्म । ॐ सर्वह वा इदं भस्म । ॐ मन एतानि चलूंषि भस्मानीति ।
भस्मधारण मन्त्र-मन्त्र पढते हुए विहित स्थानों पर भस्म लगावें-
ॐ यामुषं जमदग्नेरिति ललाटे।ॐकश्यपश्यत्र्यायुषमिति ग्रीवायाम् ।ॐ महेषुत्र्यामुषमितिभुजायाम्।ॐ तन्नोऽस्तु ज्यामुषमिति हृदये।
॥चन्दनधारण॥
मन्त्र पढते हुए पहले शिवलिंग पर चन्दन लेप करें,तत्पश्चात् स्वयं के आज्ञा चक्र पर चन्दन लगावें-
चन्दनस्य महत्पुण्यं, पवित्रे पापनाशनम् ।
आपदां हरते नित्यं, लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा॥
कांति लक्ष्मी श्रुति सौख्ये सौभाग्यमतुलं ममः ।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ॥
केशवानन्त गोविन्द वाराह पुरुषोतमं ।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं में प्रसीदतु ॥
॥कलश स्थापन॥
वरुण नमन एवं आवाहन-
ॐवरुणाय नमः।आवाह्यामि।स्थापयामि।ध्यायामि।ततो नमस्कारं करोमि।
तीर्थों का आवाहन-
कलश में जल भरते हुए मन्त्र पढें-
सर्वे समुद्राःसरितस्तीर्थानि जलदा नदाः ।
आयान्तु  देवपूजार्थं दुरितं क्षयकारकाः ॥
गङ्गे च  यमुने   चैव  गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सनिधिं कुरु ॥
कलशस्थ देवताओं को नमन एवं आवाहन-
कलश को स्पर्श करते हुए मन्त्र पढें-
ॐकलशस्थ देवताभ्यो नमः।आवाह्यामि।स्थापयामि।ध्यायामि।ततो नमस्कारं करोमि।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोदभवः।
सान्निध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा॥
॥घण्टी वादन॥
मन्त्र पढते हुए घण्टी बजायें-
आगमार्थं तु देवानां गमनार्थंच रक्षसाम् ।
कुरु घण्टे वरं नादं देवतास्थान संनिधौ ।।
घण्टीस्थिताय गरुडाय नमः ।
॥रक्षा-विधान॥
दायें हाथ में जल लेकर अपने स्थान के चारो तरफ जल छिडकते हुए मन्त्र पढें-
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमि संस्थिताः ।
ये भूता विघ्नकर्तारः ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ||
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचा: सर्वतो दिशम् ।
सर्वेषामविरोधेन पूजा कर्म समारभे ॥
॥भैरव स्मरण॥
अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम।
भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञां  दातुमर्हसि।।
॥दीप ज्वालन॥
दीपो ज्योतिपरमब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं सान्ध्य दीप नमोऽस्तुते ॥
शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यं सुख सम्पदम् ।
शत्रु बुद्धि विनाशं च दीपो ज्योतिर्नमोऽस्तुते ।।
भो दोप! देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत।
यावत् कर्म समाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव ॥
त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विद्युदग्निश्च तारकाः।
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः॥
ॐअग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा।
सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा ।
अग्निर्वच्चो ज्योतिर्वर्च्च: स्वाहा ।
सूर्यो वर्च्चो ज्योतिर्वच्चः स्वाहा ।
ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।
 ॥गुरु वन्दना॥
ॐ नमः शिवाय गुरवे सच्चिदानन्दमूर्तये।
निष्प्रपंचाय शान्ताय निरालम्बाय तेजसे ॥
॥सर्वदेव नमन॥
श्री मन्महागणाधिपतये नमः। लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः। उमामहेश्वराभ्यां नमः ।वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नमः। शचीपुरन्दराभ्यां नमः । माता पितृचरण कमलेभ्यो नमः।इष्ट देवताभ्यो नमः। कुलदेवताभ्यो नमः। ग्राम देवताभ्योः नमः। स्थान देवताभ्यो नमः। वास्तुदेवताभ्यो नमः। सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।एतत् कर्म प्रधान परमब्रह्म साम्ब सदाशिवाय नमः।
आवाहन
आगच्छन्तु सुरश्रेष्ठा: भवन्तु अत्र स्थिराः समे।
यावत् पूजा करिष्यामि तावत् तिष्ठन्तु संनिधौ॥
॥मंगल वाचन
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयामः देवा, भद्रम्पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा सस्तनूभिः, व्यशेमहि देव हितं यदायुः ।।
॥सङ्कल्पः॥
सङ्कल्प बोलने के पूर्व गोत्र,मास,तिथि तथा वार की जानकारी कर लेनी चाहिए।इनका प्रयोग करते हुए सङ्कल्प बोलें-
'ॐ विष्णवे नमः,ॐ विष्णवे नमः,ॐ विष्णवे नमः।ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे..............क्षेत्रे नगरे पक्षे...........ग्रामे ............नाम-संवत्सरे....... मासे (शुक्ल/कृष्ण)पक्षे.............तिथौ...... वासरे....... गोत्र: शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहम् प्रातः (मध्याह्ने, सायं) सर्वकर्मसु शुद्ध्यर्थं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीभगवत्प्रीत्यर्थं च शिवोपासना कर्म करिष्ये ।
॥प्राणायाम॥
अंगूठेसे नाकके दाहिने छिद्रको दबाकर बायें छिद्रसे श्वास को ॐ नमः शिवाय-मन्त्र जपते हुए धीरे-धीरे खींचते हैं। जब साँस खींचना रुक जाय,तब अनामिका और कनिष्ठिका अंगुलीसे नाक के बायें छिद्रको भी दबाकर मन्त्र जपते है।अंगूठेको हटाकर दाहिने छिद्रसे श्वास को मन्त्र जपते हुए धीरे-धीरे छोड़ते हैं।श्वास को अन्दर खींचते समय,अन्दर रोकते समय तथा बाहर करते समय मन्त्र जप की संख्या समान होनी चाहिए।
उपासना-
॥पूज्यदेव नमन॥
ॐगजाननं भूतगणादि सेवित कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम् ।
उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्॥
ॐ गं गणपतये नमः। ॐ कुल देवाय...... नमः। ॐ कुलदेव्यै.....नमः।ॐ नवग्रहेभ्यो नमः। ॐ लक्ष्म्यै नमः।ॐ विष्णवे नमः।
॥शिव पार्षदों को नमन॥
 ॐ नन्दीश्वराय नमः।ॐ वीरभद्राय नमः। ॐ कार्तिकेयाय नमः। ॐ कुबेराय नमः। ॐ कीर्तिमुखाय नमः। ॐ सर्पेभ्यो: नमः।
 ॥साम्बसदाशिव का ध्यान
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ।।
ध्यायेन्नित्यं   महेशं   रजतगिरिनिभं   चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं  प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥
(चाँदी के पर्वत के समान जिनकी श्वेत कान्ति है,जो सुन्दर चन्द्रमाको आभूषण-रूपसे धारण करते हैं,रत्नमय अलङ्कारों से जिनका शरीर उज्ज्वल है,जिनके हाथों में परशु, मृग,वर और अभय मुद्रा है,जो प्रसन हैं,पद्म के आसन पर विराजमान हैं,देवतागण जिनके चारों ओर खड़े होकर स्तुति करते हैं,जो बाघ की खाल पहनते हैं,जो विश्व के आदि जगत् को उत्पत्ति के बीज और समस्त भयों को हरनेवाले हैं,जिनके पाँच मुख तीन नेत्र हैं,उन महेश्वर का हम प्रतिदिन ध्यान करें।)
ॐ नमः शिवाय। ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि। 
ॐ नमः शिवाय।पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।हस्तयोःअर्ध्यं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।आचमनीयं जलं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।स्नानीयं जलं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।वस्त्रं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।यज्ञोपवीतं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।गन्धं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।चन्दनानुलेपनं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।पुष्पं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।विल्वपत्राणि समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।धूपं आघ्रापयामि।
ॐ नमः शिवाय।दीपं दर्शयामि।
ॐ नमः शिवाय।नैवेद्यं निवेदयामि।
ॐ नमः शिवाय।आचमनीयं जलं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।पूगीफलं समर्पयामि।
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम्।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥
देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् ।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥
सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥
कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥
कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् ।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥
देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥
अष्टदलोपरि वेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् ।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥
सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।
परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यःपठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सहमोदते ॥ ९ ॥
ॐ नमः शिवाय।स्तवपाठं समर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।तर्पयामि।
ॐ नमः शिवाय।नमस्कारान् समर्पयामि।
॥शिव पञ्चाक्षरी मन्त्र॥
विनियोग- ॐ अस्य श्री शिवपंचाक्षरी मन्त्रस्य वामदेव ऋषि पंक्तिश्छन्दः, ईशानो देवता, ॐबीजम, नमः
शक्ति,शिवायेति कीलकम, परमब्रह्म साम्बसदा शिव प्रीतये न्यासे जपे च विनियोगः।
ऋष्यादि न्यास- ॐ वामदेवर्षये नमः शिरसि।ॐपंक्तिः छन्दसे नमः मुखे।ॐ सदाशिवदेवतायै नमः हृदि। ॐबीजाय नमः गुह्ये।ॐशक्तये नमःपादयो।ॐ शिवाय कीलकाय नमः सर्वाङ्गे।
करन्यास-ॐ अंगुष्ठाच्यां नमः।ॐनं तर्जनीभ्यां नमः।ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः। ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः।ॐ वां कनिष्ठिकाभ्यां नमः।ॐ यं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हट्‌यादि न्यास-ॐ हृदयाय नमः। ॐनं शिरसे स्वाहा।ॐ मं शिखायै वषट्। ॐ शिं कवचाय हुम्। ॐवां नेत्र त्रयाय वौषट्। ॐ यं अस्त्राय फट्।
॥माला वन्दना॥
ॐमां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरुपिणी ।
चतुर्वर्गस्त्वयिन्यस्तन्मान्मे सिद्धिदा भव ॥
ॐअविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्धयर्थ प्रसीद मम सिद्धये ॥
मन्त्र-ॐनमः शिवाय।
॥रुद्राभिषेक॥
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च।
मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधि
पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम् ॥
तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रःप्रचोदयात् ॥
अघोरेभ्यो ऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्य:
सर्वशर्वेभ्यो     नमस्तेऽस्तु       रुद्ररूपेभ्यः ॥
वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय
नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय
नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो
मनोन्मनाय नमः ॥
सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः ।
भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥
नमः सायं नमः प्रातर्नमो रात्र्या नमो दिवा
भवाय च शर्वाय चोभाभ्यामकरं नमः ॥
यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत् ।
निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थं महेश्वरम् ॥
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिवबन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
सर्वो वै रुद्रस्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु । पुरुषो वै रुद्रः
सन्महो नमो नमः । विश्वं भूतं भुवनं चित्रं बहुधा जातं
जायमानं च यत् । सर्वो ह्येष रुद्रस्तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ।
उत्तराङ्ग कर्मकांड-
॥दक्षिणा॥
मैं दक्षिणा के रूप में........... समर्पित करता हूँ।
॥दान॥ 
मैं दान के रूप में...........समर्पित करता हूँ।
॥कर्म समर्पण॥
मैं अपने सभी कर्मों को भगवान शिव को समर्पित करता हूँ।
॥त्याग॥
मैं हिंसा,क्रोध तथा आलोचना का त्याग करता हूँ।
॥क्षमा॥
मैं किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपमान तथा अपराध को क्षमा करता हूं।
॥पितृयज्ञ॥
         हे गुरुदेव देवाधिदेव महादेव !आप को साक्षी बनाकर मैं अपने ज्ञात-अज्ञात तथा मुझसे कुछ भी इच्छा रखने वाले पितरों के मोक्ष हेतु अपने उपासना,आराधना,दान तथा समर्पण द्वारा अर्जित सकारात्मक ऊर्जाओं में से एक अंश समर्पित कर रहा हूँ। कृपया इसे साकार करें।
         हे मेरे ज्ञात-अज्ञात तथा मुझसे कुछ भी इच्छा रखने वाले पितृगण !आपके मेरा प्रणाम है।आप मेरे उपासना,आराधना,दान,समर्पण,त्याग तथा क्षमा द्वारा अर्जित सकारात्मक ऊर्जाओं में से दिव्य अंश अक्षय रूप में प्राप्त करें, संतुष्ट हो जाए तथा परम मोक्ष को प्राप्त करें।और मुझे तथा मेरे कुल के समस्त लोगों का अपना दिव्य आशीर्वाद प्रदान करें।
॥ब्रह्मार्पण॥
अनेन उपासनाकर्मणा ॐ साम्बसदा शिव: प्रीयतां न मम। ॐ साम्बसदाशिवार्पणमस्तु।
ॐनमः शिवाय ॐनमः शिवाय ॐनमः शिवाय।
॥आरती॥
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसार भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भव भवानी सहितं नमामि।।
॥प्रदक्षिणा॥ 
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि  नश्यन्ति प्रदक्षिण पदे-पदे ।।
॥पुष्पांजलिः॥
श्रद्धयासिक्तया भक्त्या हार्दप्रेम्णा समर्पितः ।
मन्त्रपुष्पाञ्जलिश्चायं कृपया प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त, यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
ॐ मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ॥
॥ क्षमा प्रार्थना ॥
आवाहनं न जानामि नैव जानामि पूजनम् ।
विसर्जनं     न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर ॥१।।
मंत्रहीनं क्रियाहीनं, भक्तिहीनं सुरेश्वर ।
यत्पूजितं मया देव! परिपूर्णं तदस्तु मे ॥२॥
यदक्षरपदभ्रष्टं, मात्राहीनं च यद् भवेत् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देव ! प्रसीद परमेश्वर ॥३॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या,तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति,सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥४॥
प्रमादात्कुर्वतां कर्म,प्रच्यवेताध्वरेषु यत् ।
स्मरणादेव तद्विष्णो:सम्पूर्णं स्यादितिश्रुतिः॥५
॥शुभकामना॥
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात् ॥ २ ॥
धर्मस्य जयः भवतु ।
अधर्मस्य नाशः भवतु ।
प्राणिषु सद्भावना भवतु ।
विश्वस्य कल्याणंभवतु ।
॥विसर्जन॥
यान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्टकाम सिद्धयर्थं पुनरपि पुनरागमनाय च।
॥शान्ति अभिषिंचन।।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः,शान्तिरोषधयः शान्तिः।वनस्पतयःशान्तिर्विश्वेदेवाः,
शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।सर्वारिष्ट सुशान्तिर्भवतु॥
॥आसन नमन॥  
ॐ इन्द्राय नमः।
॥सूर्यार्घ्यदानम्॥
ॐ सूर्यदेव ! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते।अनुकम्पय मां भक्त्या, गृहाणार्घ्यं दिवाकर ॥ॐ सूर्याय नमः,आदित्याय नमः,भास्कराय नमः॥