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गुरुवार, 30 जून 2022

ब्रह्मसन्ध्या

 ब्रह्मसन्ध्या-

संध्योपासन द्विजमात्र के लिये बहुत ही आवश्यक कर्म है। इसके बिना पूजा आदि कार्य करने की योग्यता नहीं 
आती। अतः द्विजमात्र के लिये संध्या करना आवश्यक है।स्नानके बाद दो वस्त्र धारणकर पूर्व,ईशानकोण या उत्तर 
की ओर मुँह कर आसन पर बैठ जाना चाहिए।आसन की ग्रन्थि उत्तर दक्षिण की ओर हो।
॥आचमन॥
विनियोग-ॐ ऋतं चेति माधुच्छन्दसोऽघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तं दैवतमपामुपस्पर्शने विनियोगः। 
मन्त्र-ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत।ततः समुद्रो अर्णवः।समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो 
अजायत।अहोरात्राणिविदधद्विश्वस्य मिषतो वशी सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो 
स्वः।
॥रक्षा-विधान॥
तदनन्तर दायें हाथमें जल लेकर बायें हाथसे ढककर 'ॐ' के साथ तीन बार गायत्रीमन्त्र पढ़कर अपनी रक्षा के लिये 
अपने चारों ओर जल की धारा देना चाहिए।
॥प्राणायाम॥
अंगूठेसे नाक के दाहिने छिद्र को दबाकर बायें छिद्रसे श्वास को मन्त्र जपते हुए धीरे-धीरे खींचते हैं। जब साँस 
खींचना रुक जाय,तब अनामिका और कनिष्ठिका अंगुली से नाक के बायें छिद्रको भी दबाकर मन्त्र जपते है।अंगूठे 
को हटाकर दाहिने छिद्र से श्वास को मन्त्र जपते हुए धीरे-धीरे छोड़ते हैं। इस समय ललाट में श्वेतवर्ण शंकर का 
ध्यान करना चाहिये।श्वास को अन्दर खींचते समय,अन्दर रोकते समय तथा बाहर करते समय मन्त्र जप की संख्या 
समान होनी चाहिए। 
विनियोग– ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिदैवी गायत्री छन्दः अग्निः परमात्मा देवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः।
मन्त्र-ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्।ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो 
नः प्रचोदयात्।ॐआपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।
॥आचमन॥
प्रातःकाल का आचमन-
विनियोग-सूर्यश्च मेति नारायण ऋषिः अनुष्टुप्छन्दः सूर्यो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः। 
मन्त्र-ॐ सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम् । यद्रात्र्या पापमकार्ष मनसा वाचा हस्ताभ्यां 
पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥
सायंकाल का आचमन– 
विनियोग-ॐ अग्निश्च मेति रुद्र ऋषिः प्रकृतिश्छन्दोऽग्निदेवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः ।
मन्त्र-ॐ अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यःपापेभ्यो रक्षन्ताम् । यदह्ना पापमकार्ष मनसा वाचा हस्ताभ्यां
पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्तदवलुम्पतु।यत्किंच दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ।
॥मार्जन॥
इसके बाद मार्जनका निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बायें हाथमें जल लेकर कुशोंसे या दाहिने हाथकी तीन 
अंगुलियोंसे १ से ७ तक मन्त्रोंको बोलकर सिरपर जल छिड़के। ८वें मन्त्रसे पृथ्वीपर तथा ९वेंसे फिर सिरपर जल 
छिड़कें-
विनियोग-ॐ आपो हि ष्ठेत्यादित्र्यृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्री छन्दः आपो देवता मार्जने विनियोगः।
मन्त्र-१.ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः।२.ॐ ता न ऊर्जे दधातन।3.ॐ महे रणाय चक्षसे।४.ॐ यो वः शिवतमो रसः।५.ॐ 
तस्य भाजयतेह नः।६.ॐ उशतीरिव मातरः।७.ॐ तस्मा अरं गमाम वः।८.ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ ९.ॐ आपो 
जनयथा च नः।
॥मस्तक पर जल छिड़कना॥
मस्तक पर जल छिड़कनेके विनियोग और मन्त्र निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बायें हाथमें जल लेकर दाहिने हाथसे 
ढक लें और निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर सिरपर छिड़कें।
विनियोग-द्वपदादिवेत्यस्य कोकिलो राजपुत्र ऋषिरनुष्टुप् छन्दः आपो देवताः शिरस्सेके विनियोगः ।
मन्त्र-ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव ।पूतं पवित्रेणेवाज्यमाप: शुन्धन्तु मैनसः ॥
॥अघमर्षण॥
अघमर्षण और आचमनके विनियोग और मन्त्र-नीचे लिखा विनियोग पढ़कर दाहिने हाथमें जल लेकर उसे नाकसे 
लगाकर मन्त्र पढ़े और ध्यान करे कि 'समस्त पाप दाहिने नाकसे निकलकर हाथके जलमें आ गये हैं। फिर उस 
जलको बिना देखे बायीं ओर फेंक दें।
विनियोग-अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तो देवता अघमर्षणे विनियोगः ।
मन्त्र- ॐ ऋतञ्च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततोराज्यजायत । ततः समुद्रो अर्णवः । समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो 
अजायत ।अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी सूर्याचन्द्रमसौ धातायथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च 
पृथिवींचान्तरिक्षमथो स्वः ॥
॥आचमन॥
विनियोग-अन्तश्चरसीति तिरश्चीन ऋषिरनुष्टुप् छन्दः आपो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः ।
मन्त्र- ॐ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः।त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम् ॥
॥सूर्यार्घ्य॥
अर्घ्य  में चन्दन और फूल मिला लेना चाहिए।सवेरे और दोपहरको एक एड़ी उठाये हुए खड़े होकर अर्घ्य देना 
चाहिए।सबेरे कुछ झुककर खड़ा होना चाहिए और दोपहर को सीधे खड़ा होकर और शाम को बैठकर अर्घ्य देना 
चाहिए। सबेरे और शाम को तीन-तीन अञ्जलि देना चाहिए और दोपहर को एक अञ्जलि अर्ध्य देना चाहिए।सुबह 
और दोपहर को जल में अञ्जलि उछालना चाहिए और शाम को धोकर स्वच्छ किये स्थल पर धीरे से अर्ध्य की 
अञ्जलि देना चाहिए।ऐसा नदी तट पर करना चाहिए।अन्य जगहों में पवित्र स्थल पर या वर्तन में अर्ध्य देना 
चाहिए,जहाँ पैर न लगे।
विनियोग-ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता अर्घ्यदाने विनियोगः।
मन्त्र-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।ब्रह्मस्वरुपिणे सूर्यनारायणाय नमः।
विशेष-यदि समय (प्रातः सूर्योदय तथा सूर्यास्त से तीन बड़ी बाद) का अतिक्रमण हो जाय तो प्रायश्चित स्वरुप निम्न 
मंत्र से एक अर्ध्य पहले देकर तब उक्त अर्ध्य देना चाहिए।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ।
॥सूर्योपस्थान॥ 
विनियोग-तच्चक्षुरित्यस्य दध्यङ्ङथर्वण ऋषिरक्षरातीतपुरउष्णिक्छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।
मन्त्र-ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदःशतं जीवेम शरदः शत शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम 
शरदःशतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।
॥षडङ्गन्यास॥
(१)ॐ हृदयाय नमः (दाहिने हाथ की पाँचों अंगुलियों से हृदय का स्पर्श करना चाहिए )।(२)ॐ भूः शिरसे स्वाहा 
(मस्तक का स्पर्श करना चाहिए )।(३)ॐ भुवः शिखायै वषट् (शिखा का अँगूठे से स्पर्श करना चाहिए )।(४)ॐ स्वः 
कवचाय हुम् (दाहिने हाथ की अंगुलियों से बायें कंधे का और बायें हाथ की अंगुलियों से दायें कंधे का स्पर्श करना 
चाहिए )।(५)ॐ भूर्भुवः स्वः नेत्राभ्यां वौषट् (नेत्रों का स्पर्श करना चाहिए )।(६)ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट् (बायें 
हाथकी हथेली पर दायें हाथ को सिरसे घुमाकर मध्यमा और तर्जनी से ताली बजाना चाहिए )।
॥गायत्री माता का ध्यान तथा आवाहन॥
आयातु  वरदे  देवि !   त्र्यक्षरे  ब्रह्मवादिनी ।
गायत्रिच्छन्दसां मातः ब्रह्मयोने नमोऽस्तुते ॥
ॐ गायत्र्यै नमः।आवाहयामि,स्थापयामि,ध्यायामि।ध्यानार्थे भक्तिभावं समर्पयामि।ततो नमस्कारं करोमि।
॥सूर्य का ध्यान तथा आवाहन॥
पद्मासनः पद्मकरः पद्मगर्भः समद्युतिः। 
सप्ताश्वः सप्तरज्जुश्च द्विभुजः स्यात् सदारविः।।
ॐ कुलदेवसूर्यस्वरुप साम्बसदाशिवाय नमः।आवाहयामि,स्थापयामि,ध्यायामि।ध्यानार्थे भक्तिभावं समर्पयामि।ततो 
नमस्कारं करोमि।
॥गायत्री प॥
गायत्री मन्त्र का १०८ बार जप करे। १०८ बार न हो सके तो कम-से-कम १० बार अवश्य जप किया जाना चाहिए।
विनियोग-ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः परमात्मा देवता,ॐ भूर्भुवः स्वरिति महाव्याहृतीनां परमेष्ठी प्रजापति 
ऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि अग्निवायुसूर्या देवताः,तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता 
जपे विनियोगः।
मन्त्र्रार्थ चिन्तन-ॐ कुल देवाय सूर्याय नमः।प्राणस्वरुप,दुख नाशक और सुखस्वरूप,सृष्टिकर्ता,प्रकाशमान 
परमात्मा परमब्रह्म साम्वसदाशिव के उस वरणीय सूर्यस्वरुप तेज को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करते हैं,जो 
हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।
मन्त्र-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
॥सूर्य-प्रदक्षिणा॥
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि   सर्वाणि   नश्यन्तु   प्रदक्षिणपदे पदे ॥
॥भगवान्‌ को जप का र्पण॥
अनेन गायत्रीजपकर्मणा सर्वान्तर्यामी भगवान् नारायणः प्रीयतां न मम।
॥गायत्री माता का विसर्जन॥
विनियोग–उत्तमे शिखरे' इत्यस्य वामदेव ऋषिरनुष्टुप् छन्दः गायत्री देवता गायत्रीविसर्जने विनियोगः।
मन्त्र-
ॐ उत्तमे  शिखरे  देवी   भूम्यां  पर्वतमूर्धनि ।        
ब्राह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि! यथासुखम्॥
॥संध्योपासनकर्म का समर्पण॥
अनेन संध्योपासनहवनाख्येन कर्मणा श्रीपरमेश्वरः प्रीयतां न मम।ॐतत्सत् श्रीब्रह्मार्पणमस्तु।
॥भगवान् का स्मरण॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्  ॥
श्रीविष्णवे नमः,श्रीविष्णवे नमः,श्रीविष्णवे नमः॥
श्रीविष्णुस्मरणात् परिपूर्णतास्तु।